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Saturday, March 20, 2010

इंतज़ार

कभी करते हुए इंतज़ार तुम्हारा अगर
मैं थक के बैठ जाऊं कहीं
तुम्हे लगे, अब मैं
तुम्हारा इंतज़ार नहीं कर रही

कुछ बात न करूं तुमसे,
कुछ न कहने को हो न सुनने को
करोड़ों शब्दों की बकबक के बाद
एक दम ख़ामोशी मिले

अगर तुम्हे लगे - अजीब सा
जैसे कभी वक़्त बीत जाता है

याद करना जनम दर जनम सदी दर सदी
मैं बस प्यार किया है तुमसे, और इंतज़ार
अब आओगे, अब आओगे, अब आओगे...

मेरे शब्द तो कहीं चार जनम पहले ही बीत गए
और कुछ सोल्हा जन्मों से थकी हूँ
पिछले सात जन्मों से हारी हुई हूँ
उनमे से तीन में बडबडाती रही
और चार, चुप पड़ गयी

तुम्हे लग रहा है मुझे इंतज़ार नहीं, प्यार नहीं?
शायद जीता जगता इंसान ही नहीं वहां, जहाँ मैं थी

छुओ उस पत्थर को, थामे रहो थोड़ी सी देर
कुछ गर्मास मिलेगी तो पिघल जायेगा
मैं बस इस उम्मीद पे जिंदा हूँ
तुम आओगे, फिर से जीना भी आ जायेगा |

Monday, March 8, 2010

वीरानी

याद आ रही है मुझे किसी की
पर किसकी मुझको याद नहीं
खालीपन है और थकान भी है
और फिर भी कुछ फ़रियाद नहीं

या फिर शायद फरियादें हों
पर फरियादों में शब्द नहीं
वैसे भी कहीं कोई शब्द नहीं
जहाँ हैं भी वहां भी शब्द नहीं

किसी परी-कथा का हिस्सा हूँ मैं
खुद अपना पता हूँ भूल गयी
इस जनम में किससे मिलना था
कब कौन कहाँ, सब भूल गयी

तेरा मुझसे वादा था तू
फिर मुझको ढूँढ निकालेगा
तू सामने भी पड़ जाये तो
तू कौन बता ? मैं भूल गयी...

शायद मेरी यादों में जब
एक टीस उठा करती है तब
शायद करती हूँ याद तुझे
शायद करती फ़रियाद तेरी
तू उसी समय का किस्सा है
तो तुझको तोड़ पता होगा
आ फिर से मेरी याद में आ
और खुद को कोई नाम तो दे
मैं कैसे तुझे पहचानू बता
तू ही मुझको पहचान ले
बड़ी वीरानी सी छाई है
और याद भी मुझको आई है
पर किसकी मुझको याद नहीं
पर किसकी मुझको याद नहीं...