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Monday, March 8, 2010

the dark corner

'Nothing about you moves me'
is what he said one day
and I choose to remember that and not
that he'd also said
there's a lot of goodness in me -

From that I remember
him describing goodness in other people
I feel as if something escapes from inside me
looks for a little dark corner somewhere
and hides
so the glare from the brightness being described
doesn't blind
doesn't hurt
even as it outshines
my defeated self...

I know this is not what he meant to do
And I know this is not how I ought to understand
He states, because he sees
he sees and he feels
and an expression of truth of a moment
or an eternity
is just that - that it is -
an expression of truth
I understand -

But I do not come out
of that little dark corner
as I hope he sees - a light in me -

......

And then one day, she shone so bright
that there was no dark corner at all
secretly she had learned to talk to the light inside
and that was hers to call...

Nothing about you moves me -
She remembered -
Nothing about him moved her either, it never had -
Except - that he WAS
and that she 'loved'
Everything else
disappeared
with the dark corner!

Glitter

1.

I am scared that I will lose
certain conversations
expressions - and forget
the movement of your eyes
the lightness of your smile
I already remember - just some parts
(that I knew I wouldn't forget
even while they were being said)
And have forgotten so much ...

2.

In ordinary sand sometimes
in some kinds of light -
you can see
- glitter -
and even when you let the sand fall
and brush your hands and all
it shines...
Is that - stardust?
Why do I have the memory so vivid
of eyes looking at tiny palms
outstreacherd, and glittering
with stardust?

3.

Is it true that I do not know
how to desire?
that an 'I' as strong as mine
is hidden behind what others want and not 'me' -
And that I have no idea of what
I want -
Of course -
its true -
and I have known it forever -
Yet -
it was you who found the words to say it
Not me....

4.

Who am I to you?
What role do I play in your life?
And how is it not a question of self-worth
When my love has defined me forever,
Except this once...
But still..
The thought is new to me
And I am used to defining myself
With my love and in rejection I feel
- worthless - till I find myself again
And talk me out of misery and myth and insecurity -

May be its a good thing
that I am nothing to you,
Because if I were, I'd be content in
that answer -

Now - I break - the question - and ask -

Who am I?

Who - am - I?

5.

I am scared that I will lose
certain conversations
expressions - and forget
the movement of your eyes
the lightness of your smile
I already remember - just some parts
(that I knew I wouldn't forget
even while they were being said)
And have forgotten so much ...

बहुत, बहुत, बहुत, बहुत, बहुत, बहुत...

पुकारूंगी तो लौट आओगे क्या?

हाँ गलत नहीं हो तुम चले जाने में
कि आखिर मिल के भी तो लड़ा ही करते थे ना
कहाँ थे दोस्त ? अब तो पता तक नहीं मुझे
कि आखिर पास थे तब पास तो नहीं ही थे
हाँ तुम्हारा थक के जाना, इससे जायज़ कुछ नहीं
हाँ तुम्हारा लौट के फिर ना भी आना सही है
तुम हर चीज़ में तो सही नहीं हो शायद
तुम्हारा छोड़ जाना सही है...

मेरे दोस्त और दुश्मन मेरे, तुम याद आते हो
जब आँखें भरने लगती हैं तो फिर मैं पूछती हूँ, क्यों?
कि आखिर रिश्ता ही क्या था कि मैं अब रो रही हूँ?
कि कोई वादा कोई झूठ कभी भी नहीं था...
कोई उम्मीदों के हक नहीं थे, कुछ भी नहीं था फिर?
मेरे दोस्त और दुश्मन मेरे, तुम याद आते हो
जब आँखें भरने लगती हैं तो फिर मैं पूछती हूँ, क्यों?

हाँ मैंने ही कहा है कहाँ मुझको संभाल पाओगे
और यह भी तो आकर भी तुम ना पहुँच पाओगे
हाँ मैंने ही कहा कि रिश्ता हो तो भी नहीं होगा
चलो जाओ चले जाओ चले जाओ कहा मैंने...
यह हक मेरा नहीं कि 'डरों' को समझो तुम
यह हक मेरा नहीं कि विश्वास करो इतना कि मुझे फिर आ जाये उम्मीद रखना - विश्वास करना
यह हक मेरा नहीं कि छू भर के तोड़ दो दीवारें सारी,
यह हक मेरा नहीं पहुंचू मैं तुम तक
यह हक मेरा नहीं की समझो मुझको
यह हक मेरा नहीं की समझू तुमको
हाँ शायद ठीक ही है - फासला जो है - 'हकों' का है
या शायद डर यह मेरे, ठीक हों कहो?

हाँ शायद ठीक ही है फासला जो है
.....

गले में अटके हो... बाँहों में ले लो...
मैं शायद रो लूं तो जीने लगूं फिर...
मैं मर के याद आउंगी ना तुमको, इतना तो बता दो?
मैं तुमको याद आती हूँ क्या....
तुम मुझको बहुत याद आया करते हो...
और मैं तुमसे कह भी नहीं सकती हूँ अब
और जाने कबसे कि तुम यह जानना चाहते नहीं हो...
तुम मुझको बहुत याद आया करते हो...
तुम मुझको बहुत याद आया करते हो...
तुम मुझको बहुत याद आया करते हो...
बहुत, बहुत, बहुत, बहुत, बहुत, बहुत...

पुकारूंगी तो लौट आओगे क्या?

यह सच भी हो शायद की खुद को मार रही हूँ

यह सच भी हो शायद की खुद को मार रही हूँ

मुझे यह पता है ज़रूर
कि तेरे ना होने का दर्द उतना नहीं होता
कि जितना वह, कि जब तू पूछ लेता है
मैं कैसी हूँ...
यह टुकड़ों में मिला रिश्ता - तेरा और मेरा
बहुत मुश्किल हो जाता है
मैं खुद को समझा के मना के बैठी होती हूँ कि मैं कुछ भी नहीं तेरी
तू क्यों फिर पूछ लेता है, मैं कैसी हूँ?

तुझे इससे ये वास्ता ही क्या
कुछ एक देर चलके छोड़ देगा साथ मेरा
जो शब्द ज़ोरों से मुझको यह बतलाते रहे हैं
उन्होंने यह तो नहीं कहा की चले जाने से मेरे
तुझे कुछ फर्क पड़ेगा?
स्विच है ना? बंद हो जायेगा, बहुत आसानी से...

जो सीमाहीन हो उसको तू कहता है
तेरी सीमाओं में मुझको बता, जी जाये वह कैसे?
तुझे तो, 'प्यार' है यह तक नहीं पता
तुझे तो, 'प्यार' है यह तक नहीं पता...
तेरी सीमाओं में मुझको बता, जी जाये यह कैसे?

मुझे अब इतनी आदत हो चली है
की जो बोलेगा तू वह चुभेगा ही
मैं अपने आप को इतना संभाले फिर रही हूँ
और मेरे दरवाज़े भी सब बंद ही हैं

मेरी निभ जाएगी इन्ही बंद दरवाजों के पीछे सुन
तू कुछ कर सकता हैं तो यह कर,
की अब दस्तक ना दे
मत पूछ मुझसे कैसी हूँ मैं
मैं रोती हूँ तो तुझको कुछ नहीं होता
तड़पती हूँ, मरे जाती हूँ, मुह फेर लेता है
मेरे भीतर जो सबसे गहरा है
तू उसको 'झूठ' कहता है...
तो इससे फर्क क्या पड़ता है, की कैसी हूँ मैं?
मैं सचमुच कैसी हूँ, इससे तो कोई फर्क नहीं पड़ता?

तेरे रिश्ते की शर्त यह है गर, की बीमार मैं रहूँ..
या कुछ बहुत हो गड़बड़ की जिसको ठीक करदे तू
यह छलावा, यह प्राथमिकताएं अपने पास ही रख
तेरे आने क्या क्या मतलब?
की तू तो आएगा तब जब तुझे आना होगा
मैं किस पल मर रही थी, इसका तुझसे वास्ता क्या?

तू क्यों फिर पूछ लेता है, मैं कैसी हूँ?

तुमको लिखी एक और चिठ्ठी - 1

तुम्हे समझ आता तो तुम बता दो
क्या करूं मैं
सांस, ऊपर की ऊपर है, नीचे की नीचे
तुम्हे कुछ कह नहीं सकती कि आखिर
तुम्हे तो प्यार नहीं है ...

लगता है अब बात होगी तुमसे तो रो पडूँगी
मन गले तक भर आया है
क्यों तुम्हारे पास नहीं हो सकती हूँ?
क्यों साथ नहीं हो सकती?
कब पिछली बार हुआ था ये,
अब याद भी नहीं मुझे
हुआ करता था, पता है लेकिन....
और शायद यह भी बीत जायेगा...
लेकिन अभी तो लगता है, जो कुछ है, हमेशा सा है
और चाहती भी नहीं, कि बीत जाये यह..
मैं जानती हूँ शायाद गलत हूँ मैं... लेकिन शायद, नहीं भी तो ?

कोई किसी को बंदिशों में नहीं बाँध सकता
तुम मुझसे पूछोगे, क्या रोज़ सुबह एक बार बात करूं तो तुम्हारा दिन बहतर बीतेगा?
नहीं मेरी जान, तब बहतर बीतेगा जब तुम्हारी आवाज़ में भी उतना ही इंतज़ार हो, जितना की मेरी
प्यार अहसानों तले दब जाता है और दोस्ती भी
मैं तुमपर बंदिशे नहीं डाल सकती
लेकिन मैं यह रोक भी नहीं सकती जो हो रहा है
यह दर्द, यह भरापन... यह अपनापन..

बस उम्मीद कर सकती हूँ कि तुम इसको झेल पाओ अगर, जी न पाओ तो
कि कहीं दूर न चले जाओ... पास न भी आओ तो
मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है
न होगी इन वजहों से कभी - शिकायत भी हक मांगती है मेरी जान
मुझे तो यह हक भी नहीं
की मुह उठा के तुम तक, पहुँच ही जाऊं...
तुम्हारे सिरहाने बैठी रहूँ...कोई किताब ही पढ़ते भले...
मेरे पास होने से तुम्हे नर्मास मिले...

तुम्हे समझ आता तो तुम बता दो
क्या करूं मैं?

तुममे कुछ है... जो मेरा है... सदा सदा के लिए...

तुममे कुछ है जो बहुत दूर है मुझसे
और तुममे कुछ वह भी है, बहुत पास है मेरे जो
जिसकी साँसे महसूस हुआ करती हैं बिलकुल वैसे
जैसे मेरी अपनी धड़कन..

तुममे कुछ है जो बहुत दूर है मुझसे
यह शायद वह है कि जिसको तुम, खुद के पास पाते हो
जो जाने-अनजाने 'तराश कर' खड़ा किया है तुमने
जो टूटेगा नहीं, बहकेगा नहीं, सही और गलत जानता है, वक़्त को पहचानता है, समझदार है

अपने सही गलत में नापा तुला, खुद को अकेला भी पता है तो
उसे पता है, उसका सही गलत ज्यादा ज़रूरी है
और निडर, बेधड़क दुनिया भर से लड़ कर, खड़ा रहेगा वह

उसका सच, उसको मिल ही जायेगा
वह सोचता है, मानता है, जानता है,
जीत जायेगा वह
हार मुमकिन ही नहीं... वह अपने डरों को यूंही नहीं भगा देता
जीत मुमकिन है, इसके कारण हैं,
मस्तिष्क मन से बलवान है, या फिर एक ही हैं दोनों
मन डरता है तो मन को डरा देता है
मन फिर रहता ही नहीं
चुपके चुपके से, मस्तिष्क की ढूँढ कर भाषा - कुछ कुछ कहा करता है - उन्ही दायरों में रह कर
मस्तिष्क को, डर जाना, हार जाना, खो जाना,
मंज़ूर नहीं है..
तुममे कुछ है जो बहुत दूर है मुझसे

और तुममे कुछ वह भी है, बहुत पास है मेरे जो
जिसकी साँसे महसूस हुआ करती हैं बिलकुल वैसे
जैसे मेरी अपनी धड़कन..
कभी तुम्हारी आँखों से झांकता है कभी
आवाज़ में सिहर सा जाता है
कभी हंसी में आ जाता है
कभी गुस्से पे छा जाता है
यह वह है
जो नहीं जानता
और जिसको 'न जाना' मंज़ूर है..
यह वह है जिसको समेट कर, सहेज कर, बहुत प्यार से जीना होगा
यह वह है कि मस्तिष्क तुम्हारा मानेगा ही नहीं, की है यह,
या इसके होने के पीछे की कहानियों और कारणों में खो देगा इसे
यह वह है, जो जाते जाते लौट आया था..

यह वह है
जो कहीं भीतर से थाम लेता है ....
जिसको आता है थाम लेना, बिना छुए , बिना कहे, बिना मांगे
मेरी रौशनी से इसकी रौशनी जगमगाने लगती है
इसकी रौशनी से मैं... जीने लग जाती हूँ
इसे सोच के, अटका रहता है आँखों में आंसूं कोई चाव्बीसों घंटे
मेरा नहीं है, इसका है, इसका नहीं है, मेरा है...

तुम चले जाओगे तो भी पास रहेगा
मैं चली जाउंगी, तब भी...
मेरा कुछ है जो अब हमेशा के लिए इसका है
इसका कुछ है, जो मेरा है सदा सदा के लिए

तुममे कुछ है... जो मेरा है... सदा सदा के लिए...

गर्मास

चलो बाहर बैठ ज़रा चाय पीते हैं
अंगडाई ले रही है सुबह धीरे धीरे से

ठंडी बड़ी होगी अभी
और फर्श भी कुछ ठंडा सा
सुनो शाल लेते आना तो
ज़रा शाल लेते आना तुम

पूरी हथेली में पकड़ लो ग्लास - मज़ा आएगा
भर जाने दो उँगलियों से गर्मास - मज़ा आएगा
तुम चाय पीने लगो अब - अच्छा चलो बस, मत पियो
तुम मुझको देख के क्यों हंस रहे हो?

इतनी सी है सुबह, एक पल में निकल जायेगी
यह काम क्यों करते हैं हम? यह काम क्यों करते हैं हम?
अच्छा मुझे जवाब मत दो, पता है क्या कहोगे तुम
अच्छा कहो भी, तुमको ही तो सुनने को बैठी हूँ यहाँ
तुम मुझको देख के क्यों हंस रहे हो इस तरह ?

भर जाने दो उँगलियों से गर्मास - मज़ा आएगा....

किसी बात पर तेरी कभी

किसी बात पर तेरी कभी
या खुद के ही खयाल पर
मुसकुराती रहती हूँ आजकल
कुछ गुनगुनाती रहती हूँ
जानने वाले कहते हैं यह तो
जाना पहचाना लगता है
जाना पहचाना लगता है...

बहते हुए पानी को कोई कैसे रोक ले
कि बाँध बनाने कभी सीखे नहीं मैंने
कहीं और कर दिया जाए, आज रुख इसका
बहता है तेरी ओर, मगर आज न बहे?
कुदरत का कोई खेल होगा - मान लेती हूँ
हंस के कभी रोक के, यह अहसास होता है
हथयार डल गए हैं, मैं हार गयी हूँ
न जाने क्यों फिर भी खड़ी - मुसकुरा ही रही हूँ...
बहते हुए पानी को कोई कैसे रोक ले?

किसी बात पर तेरी कभी
या खुद के ही खयाल पर
मुसकुराती रहती हूँ आजकल
कुछ गुनगुनाती रहती हूँ
जानने वाले कहते हैं यह तो
जाना पहचाना लगता है
जाना पहचाना लगता है...

हर बारिश बतानी है मुझे

किसी ने मुझे कहा था कभी
"मैं तो वह हूँ कि हर बारिश बतानी होती है मुझे"
और मुझे लगा था, कि हर बारिश सुननी है - तू बता, मैं सुनती हूँ..

मेरा हाल भी कुछ ऐसा ही है
कि हर बारिश बतानी है मुझे
हाँ तू वोह नहीं, जिसे सुननी हो हर बारिश मेरी..
पर मेरा हाल कुछ ऐसा ही है

मैं जानती हूँ जहाँ जवाब ढूँढने को चलूंगी वहां
सवाल उठते जायेंगे
मैं जानती हूँ इस बारे मैं, खुद तक से नहीं की जा सकती बातें
या फिर ऐसा है, कि बस बातें ही की जा सकती हैं

कभी मन चाहता है, तेज़ बारिश हो और
तू भी बहे मेरी तरह, मेरे साथ, बिलकुल बेफिकर
यह अहसास तुझे जुदा है, छुए तुझे और छू के फिर,
कुछ बावरा सा कर दे यह
मैं जहाँ हूँ तू वहां हो, उतनी किसी ऊंचाई पर,
और खुद से बिलकुल जुड़ा भी
और मुझसे भी जुड़ा हुआ..
यह अहसास
तुझे जुदा है....

और फिर संभल जाता है मन
मैं अपने ही हिचकोलों में, तुझको कहीं डुबो न दूं,
फिर, चुप ही हो जाता है मन..

पर हाल कुछ ऐसा ही है
कि हर बारिश बतानी है मुझे
हर बारिश बतानी है मुझे

Saturday, March 6, 2010

तू मेरा होता क्या है?

कोई बता दे तो भला हो
तू मेरा होता क्या है?
तेरी परछाई सी महसूस हुआ करती है
कहीं सब बहसों से अलग
सब बातों से जुदा
उस सब से भी जुदा जो मैं खुद से कहा करती हूँ
तेरा इंतज़ार रहता है ...
यह इंतज़ार भी नहीं
कुछ इंतज़ार जैसा है
(अपनी परछाई से पूछ...
सब उसको पता रहता है...)

तू मेरा होता क्या है?

कुछ भी नहीं है कहने को
जो था कहा जा चुका सब
शब्दों के अंत है कहीं, और बहुत दूर भी नहीं..
डर सा लगा रहता है मुझे
कब शब्द सब झड जायेंगे?
जब शब्द यह होंगे नहीं,
क्या बात हम कर पायेंगे?
मुझको अभी हर हवा में
हर सांस में तू चाहिए
यह बीत भी जायेगा कल,
लेकिन अभी तो चाहिए....

देख खुशबू भी है बारिशों में
हवा में कुछ रंग है
मुझसे बिना बताये कुछ ....
पूछे बिना आना कभी
देख खुशबू भी है बारिशों में...

(and after at least one looong sigh)
महसूस होता है मुझे तू... महसूस होता है मुझे..

तू मेरा होता क्या है?

खुशबू वाली बारिश..

खुशबू वाली बारिश..
यह तो मुझे तब भी भाती है जब प्यार नहीं होता
फिर इसी से हो जाता है प्यार सारा
सब कुछ महकने लगता है
मुझे मेरा चहरा और मुस्कान महसूस होने लगते हैं
सुन्दर भी लगता है अपने आप में
ऐसे जैसे इस खुशबू को भी प्यार हो मुझसे
में इसकी आँखों में पूरी हो जाती हूँ
और यह मेरी...
खुशबू वाली बारिश..

हल्कि हल्कि सी ठण्ड
कभी तेज आवाज़, कभी धीमे,
टिप टिप टिप टिप
हौले से कहती है कभी
हड़का भी देती है कभी
जी करता है बाहें हो इसकी
और उनमे समां जाऊं
फिर महसूस भी होतीं है ...
खुशबू वाली बारिश..

पकड़ के हाथ बैठा रहा - यह क्या कहा जाता है?

ये इससे क्या मतलब है की कहाँ हूँ
करती क्या हूँ ?
बस यह अहसास है कि तू नहीं है
बहुत कुछ कहा रहे हैं बहुत सारे लोग और
बहुत कुछ सुन रहे हैं, सुनाई नहीं देता कुछ भी

यह ऐसा क्यों है कि पूरा प्यार भी नहीं
सर उठा के कायनात से फिर मांग लूं तुझको
या जी भर के रो ही लूं
कि तू नहीं अपना - कि यह तड़प अकेली हैं, और तू कहीं और...

यह ऐसा क्यों है की पूरा प्यार भी नहीं
कि पूरे दर्द का हक हो, तेरा हक हो, तेरा हक न भी हो तब भी

यह ऐसा क्यों है कि, इस एक बार जब मुझको नहीं चाहिए शब्द - तो तुझको चाहिए...
पकड़ के हाथ बैठा रहा - यह क्या कहा जाता है?
पकड़ के हाथ बैठा रहा - यह क्या कहा जाता है?

Thursday, March 4, 2010

बहुत चीनी खा लेने का अहसास

बहुत चीनी खा लेने का अहसास याद है
उछल उछल के बे बात हंसते जाने का?
क्या था आज की शुरुवात में?
मुझे लग रहा था सारी कायनात मेरी है

धड़कने तेज़ थी और लहर दौड़ रही थी इधर से उधर
किसी एक से ज्यादा का अहसास था
बहुत दिन बाद, कोई बहुत दूर वाला बहुत पास था,

सारी दुनिया पास थी,
मैं खुद के पास भी थी
मगर पहचान नहीं रही थी खुद को
बहुत चीनी खा लेने का अहसास था

जब उतरता है, पता है न क्या होता है?

The usage of the term "Ghadha" in a so-called poem!! WHAT?????

दोस्ती पर फर्क तो पड़ना ही था
तुम गधे हो अगर पता नहीं था तुम्हे
और तुम बहुत हवा में रहते हो
कुछ ज़मीन पे आओ, तो ज़मीं वालो का
अहसास होगा तुम्हे

मुह उठा के तुम्हे कुछ कह दूं अब?
जब कहने को कुछ है ही नहीं
कि सुबह हुई है और तुम्हारी याद आती है मुझे
तब जब की जानती हूँ लड़ के सोये हो
अभी तो दुश्मन हूँ न तुम्हारी, मैं दोस्त नहीं?

मुझे पता था तुम्हे समझ नहीं आएगा
मुझे खुद को समझने में भी तो देर लगी थी
यह वोह है ही नहीं जो हवाओं में भर के कायनात को भर देता है
मेरा जां, प्यार फिर भी है यह... याद करता है तुम्हे..

तुमसे पहले में यह सदी गली कविताये भी नहीं लिखती थी
जिनमे किसी को गधा कहना पड़े
पर तुम गधे हो तो कहो क्या करुँ
मैं मर जाओ कहीं जा के
जान मत खाओ.

Ok, this has to be the worst thing ever written, but it comes completely from the heart and I stand by every single stupid emotion! Oh well, what the heck!

काम करने दो, याद मत आओ..

हद है दिन की
जिस तरह शुरू होता है आजकल
हटो जाओ, यूँ सुबह सुबह
काम करने दो, याद मत आओ

दिन चढ़ते चढ़ते दूभर कर दोगे
मेरा जीना, मेरा मरना, सांस लेना मेरा
अब मैं बीस साल की नहीं हूँ, दिन मैं और भी बहुत कुछ करने को
हटो जाओ ना ... याद मत आओ

मेरा बस चले तो बाँध ही लूं समय
मेरा बस चले तो तुम हंसो ज्यादा
मेरा बस चले तो कुछ भली सी हो दुनिया
मेरा बस, चल तो नहीं सकता ना

यह क्या जिद है, दिन के चढ़ते ही
मेरी आँखों में हसने लगते हो?
हटो जाओ, यूँ सुबह सुबह
काम करने दो, याद मत आओ..

जाओ ना...

थम

"थम जा", कह रहा है वो जो की
मेरे सिर के उपरी खाने में बेचारा
"हाय राम इसका क्या होगा"
इसकी रटन लगाये बैठा है

तू तो कह रही थी, तुझको बहना नहीं?
यह कैसा बवाल मचा के रखा है?
चलो तमीज़ से पेश आओ कुछ
ऐसे बच्चों की तरह बहते नहीं

और एक मैं हूँ मुझे पता है क्या हो रहा है
मैं अब बस बह रही हूँ
यह प्यार से, जीवन से, शब्दों से, भावनाओ से
दोस्तों से, रिश्तो से, फूलों और बारिशों से होता प्यार है
तुम तो बस वो कड़ी भर हो जो जोड़ रही है इसको
तुम नहीं हो यहाँ - यहाँ तो बस प्यार है. ..

लेकिन वो जो सिर के उपरी खाने में बैठ मेरी चिंता कर रहा है ना
उसे नहीं पता मेरा दिल, बड़ा बुद्धिमान है...
रुलाएगा यह सच है फिर भी
संभाल भी लेगा, संभाल भी लेगा ...

मैं चाहती हूँ मेरा हाथ पकड़ के बैठा रहे थोडी देर आज

अभी कुछी दिनों पहले तो अकेली थी
इधर उधर किसी से भी बात कर के, या फिर खुद से ही
मन कुछ हल्का भी हो जाता था
नहीं भी होता था तो पता था मुझे
जो भी है, मैं हूँ, बस मैं हूँ और है ही क्या
जो जैसे बीतेगा, बीत ही जायेगा..

और अब... पता नहीं दर्द का दर्द ज्यादा है
या तुझे न बता पाने का,
मैं चाहती हूँ मेरा हाथ पकड़ के बैठा रहे थोडी देर आज
मैं चाहती हूँ मेरा हाथ पकड़ के बैठा रहे थोडी देर आज..

ज़मीन पे आने में बहुत देर नहीं लगती, है न?

ज़मीन पे आने में बहुत देर नहीं लगती, है न?
आपको पता भी होता है मगर फिर भी
इतने करीब है ज़मीन पता नहीं चलता

और उड़े जाते हो, बहते जाते हो, अनगिनत आसमानों में
बे-मंजिल, बे-रास्ता, इसलिए कि कुछ हुआ महसूस ऐसा
जिसको महसूस भर करने को - आत्मा तक तड़प रहे थे ....

कोई उबाल जो आपको गर्मी दे जाता है
था भीतर यह पता था, क्योंकि जानते हो खुद को
यह भी पता था कि बर्फ जमी है भीतर
और फिर पिघले ज़रा तो रो ही पड़े

वोह सर के कोने में बैठा आज सुबह ही तो समझा रहा था
और अब सहला रहा है ... कोई बात नहीं... पता तो था..
अभी कुछ एक दिन पहले ही तो ज़मीन के इतने पास थी तू
दो दिन कि आदत है, बीत जायेगी
... अभी अभी लगी है चोट तो दर्द ज्यादा है
यह घाव भी भर ही जायेगा...
जीने दे खुद को, जीने दे...
थोडा सा रो ले शायद बहतर लगे...

यह समय भी बीत जायेगा
यह समय भी बीत जायेगा.

मुझे ख़ुशी होगी...

I know for a fact that at least one person will find this completely arrogant and will see everything else but love in this, while to me, it is pure love... he may not understand it today but by the time he gets around to life, I have hope, he will... meanwhile, I am here, he can kill me if he wants, but till he doesnt, I am here!

अगर मैं तेरा दिल तोड़ दूं कभी वैसे की जैसे मेरा टूटा था
तबाह और तहस नहस कर दूं इस तरह कि तेरे भीतर -
हर आवाज़ रो पड़े, हर घाव रिसने लगे
हर पुरानी चोट छोटी लगे और
ऐसा हो कि सारा दर्द समेट के उडेल दिया हो किसी ने
तुझे पता ही न चले कि क्यों जीवन भर की बनायीं दीवारे
अपने आप को सुनाये, कहे गए करोडो शब्द, कुछ काम नहीं आ रहे
आ रहा है तो बस और एक टूटन का अहसास और यह कि अब आगे...कुछ भी नहीं दिखता
देखने कि काबिलियत और सोचने का सुरूर, शब्दों का प्यार तक, मर गया है
यह कमाल है कि जिंदा है तू, किसके लिए यह पता भी नहीं, पर है, कि मर नहीं सकता... न जाने क्यों कुछ ऐसा छू गया है...

तो मेरी जान मुझे ख़ुशी होगी...

मुझे ख़ुशी होगी कि मेरे अहसास से तू जीने लगा है
कि पता है मुझे बस एक वो टूटन है जो तुझे जोड़ सकती है तुझसे
जो दिल में जमी बर्फ को पिघला के तुझे - हीरे से इंसान बना सकती है
तेरी चमक में गर्मी ला सकती है

मुझे भी लगा था प्यार आता है मुझे
मुझे लगता था मेरी शब्दों ने मुझे सब जवाब दे ही दिए थे...
और फिर किसी ने मेरे पैरों तले ज़मीन निकाल दी
पहले इतनी खुशी दी कि विश्वास ही न हो,
ऐसा मिला कोई कि लगा यह ही होना था
और फिर ऐसे चल दिया कि जैसे कोई भी न हो
किसी ने मेरे पैरों तले ज़मीन निकाल दी
किसी ने मेरा आसमान खो दिया मुझसे ....
मैं थक गयी हूँ यह सच है मगर
मुझे जीना,
अहसास की गहराई,
रिश्तों को देखना, सिर्फ प्यार से और बांधना नहीं, मान लेना
लोगों को, वोह जो हैं उसके लिए प्यार करना
बुरे में भला देख पाना और हर समय यूं रहना कि जुडी हूँ - कायनात से
खुद को खो देना और फिर सही मायने में पा लेना खुद को..
मेरे दर्द ने सिखाया है
और उसने सिखाया है

मुझे नहीं पता, आज या कभी और मैं, मेरा प्यार, तेरे भीतर की वो गहराई नाप सकता है क्या
मुझे लगता है मेरा होना बस तुझे यही बतलाने को है की बहुत प्यार होता क्या है,
कैसे जीते हैं उसे
और फिर तेरा दिल तोड़ के चले जाने को

मैं तेरी मंजिल नहीं और तू मेरी मंजिल नहीं
पर यह रास्ता दिया गया है हमे तो कोई कारण होगा
मैं चाहती हूँ मेरा प्यार तुझे नरमी दे मेरी जान
और अगर तोड़ देगा तुझे, तो रोउंगी मैं
मगर खुश होंगी
अगर यह मेरी ज़िम्मेदारी है, तो यह ही सही

तुझसे यह बात कहूँगी तो बहुत खफा होगा
कम से कम मन मैं अपने बुरा भला कहेगा मुझे
और सामने भी कहा सकता है, तू तू है आखिर!
मेरा कहना की ' मैं हूँ '... येही मतलब है उसका
मैं सुनूंगी
मैं प्यार करती हूँ
तेरे दर्द का अहसास मुझे खुद से ज्यादा है

सच सच की रट में रहता है
सच सुना नहीं जाता तुझसे,
माना नहीं जाता, उसकी
अच्छाई नहीं दिखती
चुम्बक की तरह, दर्द ढूंढे जाता है, दर्द पकडे जाता है

इश्वर करे, टूट जाए एक बार, तू, तेरा अहम्, और तेरे खुद को दर्द देने का यह सिलसिला
जीने लगेगा तोह सब आसान हो जाएगा
इश्वर करे, मेरे शब्दों में सुन्दरता ढूँढने की जगह तुझे अहसास मिलें...

अगर मैं तेरा दिल तोड़ दूं कभी वैसे की जैसे मेरा टूटा था
मुझे ख़ुशी होगी.

यह कैसा पर्दा पड़ा है मेरी आँखों पर?

तेरी हर ज़िद मेरी सिरआँखों पर
तेरी हर बात का होता है असर
कभी इतना भी की लिखते लिखते
बस तुझे सोच के रुक जाती हूँ...

कितनी बातें अधूरी लगती हैं
कितने जवाब हैं जो दे ही सकती नहीं
कितने सवाल पूछे नहीं जा सकते कभी
कितना कुछ कह भी देना चाहती हूँ

मुझे खुद से लग रहा है डर ...
'मेरी जां' है तो नहीं तू तो फिर कहूं क्यों मैं?
बड़ी जुर्रत है इन शब्दों में, मुझसे लड़ भिड कर
जितना भी रोकूँ, निकल ही आते हैं

क्या पता प्यार से हो प्यार मुझे
क्या पता इसमें तू हो ही न कहीं
तेरी ही आँखें क्यों चुनी इसने?
अपनी हर हद मैं तोडे जाती हूँ ...

डरने लगी हूँ तेरे न होने से
और तुझे कुछ मांगूं, कहूं, हक भी नहीं
अब भी कहती हूँ प्यार नहीं करना तुझसे
क्यों फिर तुझी पे लौट आती हूँ?...

यह कैसा पर्दा पड़ा है मेरी आँखों पर?
यह कैसा पर्दा पड़ा है मेरी आँखों पर?